ऐसा हम सभी के साथ बहुत बार होता है की किसी व्यक्ति विशेष ने बहुत साल पहले हमें कोई बात समझाई थी, जिससे हम उस समय सहमत नहीं थे, परन्तु उस बात का सही अर्थ हमें कई वर्षों बाद समझ आता है और तब हमें अहसास होता है की उसकी कही वो बात बिल्कुल सही थी।
हम भी दिन भर न जाने कितने ही लोगो को बहुत कुछ समझाते हैं और पाते हैं की वह हमारी बातों को नहीं समझ रहा है या यूँ कहे की नज़रअंदाज़ कर रहा है।
उसे समझाने की बार बार की गई असफल कोशिशों को हम अपनी हार मान बैठतें हैं और अंदर से बिखरने लगते हैं, इसी कारण हम अक्सर अपना आपा भी खो बैठते हैं और अपना गुस्सा सामने वाले पर उतार देते हैं।
एक बात जो कभी हमारे जहन में नही आती की जैसे हमने किसी दूसरे की बात को समझने में इतने वर्ष लिए हैं, ठीक उसी प्रकार दूसरे व्यक्ति को भी हमारी बातों का अर्थ समझने में कुछ हफ्ते, महीने या वर्ष लग सकते हैं।
यहां हर किसी की अपनी सोच है हम सभी अपनी तरफ से किसी दूसरे की सोच बदलने की भरपूर कोशिश कर सकते है पर किसी की भी सोच को बदलना लगभग नामुनकिन है। यह केवल तभी संभव है जब सामने वाला खुद अपने अंदर बदलाव लाने को तैयार हो।
अगर समझाने भर से किसी की सोच बदलती तो रामायण और महाभारत का युद्ध कभी नही होता, याद कीजिये की युद्ध को टालने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने भी शांतिदूत बनकर कौरवों को समझाने की बहुत कोशिश की थी और भगवान श्री राम ने भी रावण को समझाने की भरपूर कोशिश की थी। जब स्वयं भगवान श्री राम और श्री कृष्ण भी मानव अवतार में रावण और कौरवों को नही बदल पाये तो हम इंसानो की क्या हैसियत है?
नियति में सब कुछ पहले से ही तय है हम सभी इंसान बस एक जरिया है और कुछ नही।
किसी भी इंसान की सोच तभी बदलती है जब शुरुवात उसके अंतर्मन से होती है, दूसरे द्वारा दी गयी सलाह भी तभी काम करती है जब कोई खुद को बदलने की कोशिश करना चाहता हो। इसका सब बड़ा उदाहरण है वाल्मीकि, किस प्रकार नारद मुनि की सलाह मानकर अपने अंदर बदलाव लाकर रत्नागर नाम का डाकू महर्षि वाल्मीकि में तब्दील हो गया। इसलिए हमें बिना हताश हुए बस अपनी कोशिशें जारी रखनी चहिये, किसी में बदलाव लाना कभी हमारे बस में था ही नही..
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